यह कवि अपराजेय निराला,जिसको मिला गरल का प्याला;ढहा और तन टूट चुका है,पर जिसका माथा न झुका है;शिथिल त्वचा ढल-ढल है छाती,लेकिन अभी संभाले थाती,और उठाए विजय पताका-यह कवि है अपनी जनता का!
-डॉ रामविलास शर्मा